Largest Planet in the Solar System | सौरमंडल का सबसे विशाल महासागर Jupiter के अंदर

नमस्कार दोस्तों आज हम आपको बताने जा रहे हैं Largest Planet in the Solar System, Jupiter के अंदरूनी वातावरण से जुड़े कुछ ऐसे रहस्यों के बारे में जिन से जुड़े प्रश्न खगोल वैज्ञानिकों को अक्सर परेशान करते आए हैं, जैसे कि:- जुपिटर के बिल्कुल केंद्र में क्या हो सकता है? वहां का वातावरण कैसा होगा? हम जुपिटर के ऊपरी वायुमंडलीय विशेषताओं के बारे में बहुत कुछ जानते हैं जिसमें इसके रंगीन बादलों वाले बैंड्स और उग्र यानी प्रचंड तूफान शामिल है। यह विशाल गैसीय पिंड अंदर से कैसे काम करता है? इसके ऊपरी तूफान को वह कौन सी ताकतें हैं, जो इतना बल प्रदान करती हैं?

इसके बारे में हमें बहुत कुछ नहीं पता है जुपिटर का अंदरूनी हिस्सा आज भी रहस्यों से भरा हुआ है। खास तौर पर एक सवाल कि वास्तव में इस गैस जायंट ग्रह की कोर में क्या हो सकता है? यह एक सवाल है जो दशकों से वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली बना रहा है लेकिन शुक्र है कुछ अंतरिक्षयानों का जिनकी मदद के चलते जुपिटर की गहराइयों में चल रही गतिविधियों के रहस्य अब सुलझने लगे हैं। आज हम जानेंगे कि जुपिटर की गहराइयों में इसकी कोर के करीब क्या हो सकता है? वह कौन सी ताकतें हैं जो इस ग्रह पर सदियों से उमड़ रहे तूफानों को शांत नहीं होने देती हैं?

Largest Planet in the Solar System

Jupiter’s Atmosphere Composition

सौरमंडल में King of all planets और Largest planet in the Solar System, जुपिटर वास्तव में लगभग 139,820 किलोमीटर डायमीटर के साथ एक विशालकाय दुनिया है। इसके आकार को कुछ ऐसे समझें, कि अगर पृथ्वी एक अंगूर के आकार की होती तो जुपिटर एक बास्केटबॉल जितना बड़ा होता। किसी ग्रह की तुलना में एक तारे से ज्यादा मेल खाता जुपिटर ज्यादातर हाइड्रोजन और हीलियम से बना है।

इसके वातावरण में नजर आते कुछ तूफान पृथ्वी से 2 गुना तक बड़े हैं जिनमें पैदा होती है Superfast winds and lightnings, जो 100 गुना तक चमकदार है पृथ्वी पर देखी गई lightnings से, हालांकि जुपिटर की अजीब विशेषताएं इसके घूमते हुए ऊपरी वातावरण के नीचे मौजूद है क्योंकि इन दिखाई देने वाले बादलों के नीचे हाइड्रोजन गैस गहराइयों में, इसके भयंकर वातावरणीय दबाव के चलते घनी और बेहद गर्म होने लगती हैं जैसे-जैसे यह ग्रह की कोर के करीब पहुंचती हैं। हजारों किलोमीटर नीचे दबाव इतना अधिक हो जाता है की हाइड्रोजन गैस धीरे धीरे metallic liquid के बेहद अजीब electrically charged soup में बदलनी शुरू हो जाती है।

यह बेहद मैला दिखाई पड़ता fluid, Liquid metallic hydrogen कहलाता है और वैज्ञानिकों का मानना है कि यह सौरमंडल का सबसे बड़ा महासागर है जो जुपिटर के कुल वॉल्यूम का लगभग 80% है और इतना ही नहीं इस metallic hydrogen की घूमती गति electric current को भी पैदा करती है जिनके बारे में माना जाता है कि यह जुपिटर के शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र का निर्माण करती है, जो पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से 20,000 गुना तक ज्यादा शक्तिशाली है।

यहां हमारी पृथ्वी पर लिक्विड मैटेलिक हाइड्रोजन प्राकृतिक रूप से मौजूद नहीं होती है लेकिन इसे कुछ एक्सपेरिमेंट्स के दौरान बनाया गया है हालांकि यह अपने तरल रूप को लंबे समय तक पृथ्वी पर बनाए नहीं रख पाती है इसीलिए इसे बहुत कम समय के लिए बहुत कम मात्रा में ही बनाया जा सका है। वैज्ञानिक अभी भी जुपिटर की रहस्यमई परत के अंदर होने वाली जटिल प्रक्रियाओं और ग्रह के ओवर ऑल स्ट्रक्चर और बिहेवियर पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने के लिए काम कर रहे हैं।

लेकिन आप इस Liquid metallic hydrogen को कहीं से भी जुपिटर का कोर समझने की गलती मत कीजिएगा यह जुपिटर का कोर नहीं है, यह विचित्र बेहद गर्म तरल हाइड्रोजन का महासागर दरअसल कोर को घेरे हुए है। अब सवाल उठता है कि अगर यह कोर नहीं है तो फिर नीचे क्या है? इस विशाल गैसीय ग्रह के बिल्कुल केंद्र में क्या है? बेहद शुरुआती थ्योरी ने यह सुझाव दिया था कि जुपिटर का कोर एक ठोस चट्टानी संरचना है। बेहद भारी तत्व जैसे nickel और यहां तक की अजीब प्रकार की विचित्र बर्फिय संरचना से मिलकर बना है जो आमतौर पर यहां पृथ्वी पर स्वाभाविक रूप से मौजूद नहीं हो सकती है।

यह थ्योरी जुपिटर के मजबूत गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र के ऊपर हुई observations पर आधारित थी जिसने सुझाव दिया था कि इस ग्रह के केंद्र में एक घना विशाल कोर है। हालांकि जैसे-जैसे इस ग्रह को लेकर कई वर्षों के दौरान नए-नए डाटा को जुटाया जाता रहा, वैज्ञानिकों ने इस रहस्यमय गैस जायंट के अंदर क्या गतिविधियां चल रही हैं इसको लेकर अपनी समझ को सुधारा है।

What the Juno Spacecraft Discovered on Jupiter

NASA का JUNO Spacecraft जो जूपिटर को जुलाई 2016 से लगातार orbit कर रहा है इस अंतरिक्ष यान से प्राप्त डाटा ने आश्चर्यजनक रूप से कुछ बहुत ही अनएक्सपेक्टेड सामने रखा। इससे प्राप्त डाटा ने दिखाया कि जुपिटर का कोर धुंधला सा है। जुपिटर को ऑर्बिट करते समय पता चला कि ग्रह का कोर सिंपल सॉलि़ड स्ट्रक्चर नहीं है जैसा कि पहले सोचा गया था बल्कि यह तो धुंधले मटेरियल का मिक्सचर है।

ऑब्जर्वेशंस के अनुसार सॉलिड मटेरियल को ग्रह के केंद्र में एक कंपैक्ट बॉल में ग्रह द्वारा कुचला नहीं गया, इसके बजाय ऐसा नजर आता है कि यह सॉलिड बिट्स मिक्स हो चुकी है उस हाइड्रोजन के साथ जो इसको चारों ओर से घेरे हुए है। नतीजतन एक धुंधला या जैसा कि खगोल वेदों का कहना है की जुपिटर के केंद्र में एक फैला हुआ कोर है जिसकी कोई well-defined बाउंड्री नहीं है और तो और यह ग्रह के अंदरूनी हिस्से के आधे हिस्से तक फैला हुआ है। ऐसी संरचना कैसे संभव हो सकती है यह अभी भी समझ से परे है।

हालांकि बहुत ज्यादा दिलचस्प Theories में से एक के मुताबिक जुपिटर के Past में किसी पॉइंट पर बहुत भारी टक्कर हुई होगी। पहले यह माना जाता था की यंग जुपिटर दूसरे ग्रहों से टकराने से बचता रहा था लेकिन यह धुंधला कोर एक बड़े ऑब्जेक्ट से टक्कर का नतीजा हो सकता है। पॉसिबली एक प्रोटोप्लैनेट या कोई दूसरा गैस जायंट प्लेनेट सोलर सिस्टम की फॉरमेशन के दौरान शुरुआती दौर में जुपिटर से टकराया होगा। वास्तव में सिमुलेशंस ने दिखाया है कि एक दूसरे विशाल ग्रह के साथ एक हिंसक आमने-सामने की टक्कर, गैस जायंट इस केस में जुपिटर के अंदर बड़ी मात्रा में भारी तत्वों को पहुंचा सकती है।

यंग जुपिटर से इस विशाल ग्रह की टक्कर अविश्वसनीय रूप से इतनी शक्तिशाली रही होगी जिससे गर्मी और दबाव की एक इतनी ज्यादा मात्रा पैदा हुई होगी जिसने उस वक्त के जुपिटर की ओरिजिनल कोर को तबाह कर दिया होगा। अगर बहुत वक्त पहले जुपिटर से वास्तव में कुछ बहुत बड़ा टकराया था तो संभव है कि वह पृथ्वी से 10 गुना तक भारी रहा हो। टक्कर के बाद यह जुपिटर के अंदरूनी भाग में ही घुल मिल गया और उस तरल मिश्रित संरचना को बनाया जिसे आज हम कर रहे हैं।

इस थ्योरी को सपोर्ट करने के लिए कुछ सुबूत भी हैं। उदाहरण के लिए, जुपिटर के चंद्रमा की ओर्बिट्स, एस्ट्रॉयड बेल्ट की पोजीशन, और मंगल के छोटे आकार का होना सुझाव दे देता है की यह विशाल ग्रह ने सौरमंडल की शुरुआती स्टेज में रैपिड ग्रोथ और माइग्रेशन का अनुभव किया था। इसके अतिरिक्त हमारे सौरमंडल की सिमुलेशंस ने दिखाया है कि शुरुआती समय में ग्रहों के बीच बड़े पैमाने पर टक्कर आम हुआ करती थी। जुपिटर के अंदरूनी हिस्सों को स्टडी करने के लिए यानी ग्रह के घने बादलों के नीचे जांच करने के लिए जूनो ग्रेविटी मेजरमेंटस का उपयोग करता है।

ग्रह के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में हुए छोटे से छोटे बदलावों को माप कर जूनो अंतरिक्ष यान जुपिटर के घनत्व और संरचना को तय कर सकता है। जूनो में लगा Microwave Radiometer instrument ग्रह के गहरे वातावरण द्वारा उत्सर्जित होने वाले थर्मल रेडिएशन का भी पता लगा सकता है, जो ग्रह के अंदर की कंडीशन के बारे में बताता है। जो मदद कर रहा है यह जानने में कि इन घूमते घने बादलों के नीचे क्या हो रहा है।

लेकिन एक सच तो यह भी है ना कि हमने जुपिटर के अंदरूनी हिस्सों को लेकर जो भी डाटा जुटाया है वह ग्रह के बाहर रहकर ही जुटाया है तो क्या हम भविष्य में कभी जुपिटर के अंदर कोई Probe भेज सकते हैं। Well जुपिटर के अंदरूनी वातावरण में किसी Probe को भेजना बेहद चुनौतीपूर्ण और मुश्किल प्रयास होगा। ग्रह के बादलों के नीचे की मुश्किल परिस्थितियां, जिसमें इसके जबरदस्त रेडिएशन, झुलसा देने वाला तापमान और कुचल देने वाला दबाव शामिल है। ऐसी कंडीशन किसी भी भेजे गए Probe के लिए Survive करना मुश्किल बना देंगी। हालांकि ऐसा भी नहीं है की Past में कभी इसकी कोशिश ना की गई हो।

When the Galileo Spacecraft Encountered Jupiter

दिसंबर 1995 में नासा के गैलीलियो अंतरिक्ष यान ने जुपिटर के बादलों में गैलीलियो एटमॉस्फेरिक प्रोब के रूप में जाने, जाने वाली एक सेटेलाइट को गिरा दिया था। कई वैज्ञानिक उपकरणों से परिपूर्ण इस सेटेलाइट ने तापमान के दबाव और जुपिटर के वायुमंडल की संरचना को नीचे उतरते समय मापा था।

इस ग्रुप से जो डाटा मिल रहा था वह किसी खजाने से कम नहीं था जिसमें जुपिटर पर मौजूद अलग-अलग गैसों की कंसंट्रेशन और इसके बादलों की कंपोजिशन यानी संरचनाओं के मापदंड शामिल थे। इसने जुपिटर के वातावरण में नीचे उतरते हुए बिजली गिरने का भी पता लगाया था, जो पहली बार था जब हमने ऐसा कुछ किसी दूसरे ग्रह पर सीधे देखा था। दुर्भाग्य से गैलीलियो एटमॉस्फेरिक प्रोब जुपिटर पर ज्यादा देर तक नहीं टिक सका था, यह जुपिटर के रेडिएशन और दबाव को 58 मिनट तक ही झेल सका था इसके चरम वातावरण में नष्ट होने से पहले।

galileo_probe

Mysteries of Jupiter that are yet to be discovered

बाहर से स्टडी करते हुए जूनो अंतरिक्ष यान ने हालांकि ग्रह की संरचना और व्यवहार में बेहद वैल्युएबल इनसाइट्स प्रोवाइड कराई हैं। ग्रह के रेडिएशन बेल्ट के जरिए केयरफुली नेविगेट करके और अपने सभी साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स का उपयोग करके जूनो, जूपिटर को बेहद गहराई से स्टडी करने में सक्षम हो सका है। बेशक बहुत कुछ अभी भी ऐसा है जिसके बारे में हमें जानकारी नहीं है जिसमें liquid metallic hydrogen के इस विशाल महासागर की सटीक प्रकृति और इसके धुंधले कोर के होने का कारण भी शामिल है।

इस विशाल गैसीय ग्रह के बादलों के नीचे क्या है? इसके यह रहस्य वैज्ञानिकों को आज भी उत्साहित और प्रेरित करते हैं। इस कमाल के ग्रह को स्टडी करना जारी रखते हुए हम बेशक आने वाले समय में सौरमंडल और ब्रह्मांड के बारे में कई और रहस्यों को जानेंगे। इसमें कोई शक नहीं है कि हमारा सौरमंडल कई रहस्यों से भरा हुआ है लेकिन इसके अलावा हमारे सौरमंडल में कई और ऐसी दुनियाएं हैं जिनको एक्सप्लोर किया जाना बाकी है।

चलिए जाते-जाते जुपिटर से जुड़ा आपके लिए एक सवाल, जुपिटर के अब तक कितने चंद्रमा खोजे जा चुके हैं अपने जवाब नीचे कमेंट में जरूर दीजिएगा। आज के लिए इतना ही, आपका धन्यवाद।

हाल ही में वैज्ञानिकों ने सबसे करीब के एक Globular Cluster Messier 4 में लाखों तारों के बीच एक intermediatemass black hole (IMBH) को भी खोज निकाला है जिसे आप यहां क्लिक कर कर जान सकते हैं।

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FAQ’s Related to Solar System and Jupiter

What are the 9 planets in order of size?

हमारे सौरमंडल में Pluto को भी एक ग्रह मानते हुए यह लिस्ट कुछ इस तरह बनेगी:- Jupiter (139,820 kilometers), Saturn (116,464 kilometers), Uranus (50,724 kilometers), Neptune (49,244 kilometers), Earth (12,742 kilometers), Venus (12,104 kilometers), Mars (6,779 kilometers), Mercury (4,879 kilometers) और Pluto (2,376.6 km).

Who is the largest planet in the solar system?

सौर मंडल का सबसे बड़ा ग्रह, जिसे हिंदी में "बृहस्पति" के नाम से जाना जाता है, Jupiter है। इसका नाम हिंदू पौराणिक कथाओं में देवताओं के राजा बृहस्पति के नाम पर रखा गया है, जो बुद्धि और ज्ञान से जुड़े हैं।

What are the 3 largest planets in the solar system?

सौरमंडल के 3 सबसे बड़े ग्रह Jupiter (139,820 kilometers), Saturn (116,464 kilometers), और Uranus (50,724 kilometers) हैं। यह तीनों ही गैस से बने ग्रह हैं।

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